Sunday, November 14, 2010

चाहा यही तो था की ,उस पालने की गोद छोड़ दौर जाऊं खुले जहां में मैं ...फिर क्यूँ आज नानी की वो गोद याद आती है ...जिन रजाइयों को पैरों से फेंक दिया करते थे हम ...हमें देख जैसे ,उन्ही चादरों की सिलवटें मुस्कुराती हैं ....और बचपन के वो खिलौनें ,एक नजर में ,आज हमारे दिल से खेल जाती है .....कमबख्त बचपन अब भी कितना लुभाती है ....HAPPY  CHILDRENS' DAY..!!!

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