Saturday, December 5, 2015


कुदरत 

है आँखों में तैरती, 
उमंगों की हसरत .....

उन अधरों में दबी है, 
रंगों की दौलत ....

ये केशुओं की कालिमा है,
या मेघों की रंगत ...

है ये पायल की रुनझुन ,
या तेरे क़दमों की आहत...

है बादलों की चमक ,
या तेरे होठों पे की है..
तब्बसुम  ने शिरकत 

ये हवाओं का है इशारा ..
या तेरी अधखुली पलकों ने ,
की है कोई हरकत ...

बच  के ही रहना ..
उनकी गलियों से..
राहों से भटकाना ..
ये उनकी है फितरत ...

नजरें न ही मिलाना ..
उन निगाहों से ...

रखते हैं ..वो ..
नफरत की तरकश में ..
तीर -ए -मोहब्बत ..

गर करम करना है ..तो...
बस इतना बता दो यारों....

वो कुदरत का है करिश्मा .
या उतर आई है फलक से ..
खुद कुदरत ...

..

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