Saturday, April 7, 2012

कुछ अधूरे से ख्वाब


क्यूँ   कुछ   अधूरे  से  ख्वाब  ,..
फिर  आज   पलकों  पर  छा गयी ;
जैसे  वर्षों  से  रूठी  जिंदगी ,
फिर  मुस्काई  और  कहा , ..
लो  मैं  आ   गयी ।

ये  इतेफाक़   तो   नहीं  , की  आज  इन  लबों  ने
फिर  मुस्कुराना  चाहा ;
ना  जाने  आज  क्या  हुआ  ,
की  कुछ  दबी  तमन्नाओं  को ,
दिल  ने  फिर  आजमाना  चाहा ।

ऐ   खुदा  !  है  ये  खुशियों  का  आगाज़  ,
या   फिर  आँखें  नम करने  का  इरादा  है ;
चलो  जो  भी  हो ,
अगर  बक्शा  है  तुने  ये  एहसास  ,
पल  दो  पल  के  लिए
तो  वो  भी  इस  बन्दे  के  लिए  कुछ  ज्यादा है ।

फिर  तरंगें  उठ  रही  हैं  मन  में ,
फिर  किसी  का  रहता  हर  पल  इंतज़ार  है ;
वादा  किया  था  खुद  से ,
कभी  ख्वाब  न  देखने  का  ;
पर  फिर  एक  बार  सपने  देखने  को  ,
ये  दिल  बेकरार  है  ..
ये  दिल  बेकरार  है  .. :) :)

0 comments: