क्यूँ कुछ अधूरे से ख्वाब ,..
फिर आज पलकों पर छा गयी ;
जैसे वर्षों से रूठी जिंदगी ,
फिर मुस्काई और कहा , ..
लो मैं आ गयी ।
फिर मुस्काई और कहा , ..
लो मैं आ गयी ।
ये इतेफाक़ तो नहीं , की आज इन लबों ने
फिर मुस्कुराना चाहा ;
ना जाने आज क्या हुआ ,
की कुछ दबी तमन्नाओं को ,
दिल ने फिर आजमाना चाहा ।
ऐ खुदा ! है ये खुशियों का आगाज़ ,
या फिर आँखें नम करने का इरादा है ;
चलो जो भी हो ,
अगर बक्शा है तुने ये एहसास ,
पल दो पल के लिए
तो वो भी इस बन्दे के लिए कुछ ज्यादा है ।
फिर तरंगें उठ रही हैं मन में ,
फिर किसी का रहता हर पल इंतज़ार है ;
वादा किया था खुद से ,
कभी ख्वाब न देखने का ;
पर फिर एक बार सपने देखने को ,
ये दिल बेकरार है ..

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