यूँ हथेलियों से तेरी,
कुछ उम्मीदों के रेत,
फिसल गए ..तो क्या हुआ ?
तेरी ख्वाहिशों के कुछ ,
रंगीन दायेरें ..
सिमट गए तो क्या हुआ ?
क्या हुआ जो ,
हो गया तू उदास ;
यूँ जीवन के सफ़र में ,
कुछ लोग ..
बिछड़ गए तो क्या हुआ ..?
हर सुबह नयी
किरनें लेकर आती हैं
हर शाम ये किरनें .
ढल गए तो क्या हुआ . .?
हाँ , चाहता है भूलना ..
कुछ लोगों को तेरा मन ,
पर कुछ चेहरे . .यादों में ..
बस गए .. तो क्या हुआ ?
हर पल नजारा खुबसूरत हो ,
ये जरूरी तो नहीं ;
कुछ पल बहारों के दीदार को
ये आखें ...
तरस गए .तो क्या हुआ ?
बारिशों में खेलने का ,
एक अपना है मज़ा ;
यूँ मैदानों पर बादल ,
बरस गए तो क्या हुआ ?
दोस्तों का साथ भी कुछ ,
कम नहीं हैं तेरे पास ;
इस दुनिया में अब कुछ लोग ,
दुश्मन बन गए ..तो क्या हुआ ?
यूँ तो मर्यादों में रहना ,
खूब आता है तुझको ;
कुछ पल यूँ मौज में ..
बहक गए ..तो क्या हुआ ?
हर पल जो बेतहासा दौड़ती रहती है ,
आराम की तलाश में ;
थक कर कुछ पल वो कदम .
ठहर गए तो क्या हुआ . .??
महकती रहती है तेरी बगिया,
खुशियों के फूलों से ;
हाथों में कुछ दुःख के कांटें ..
चुभाक गए तो क्या हुआ ?
क्या हुआ जो ..
नम हो गयी तेरी आँखें ;
खैर ..खुशियों के कुछ आंसू ,
छलक गए तो क्या हुआ ?
क्या हुआ ?..क्या हुआ ?
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