Tuesday, April 3, 2012

मंजिल ...


घुप   अँधेरे   में  गुम,
हम  अपनी   दिशा  धुंध  लेंगे;
अपने  वजूद  की  महिमा  ,
अपनी  गरिमा  धुंध  लेंगे ।

जो  रोपे  थे  हमनें   पौधे  ,
अब  तक   नहीं  हैं  मुरझायें ;
हम  बेरंग  नहीं  ,
बस  अब  तक  अपने  रंग  में  नहीं  आये ।

बहुत  हो  चुकी  मरने  की  बातें ,
अब  जीवन  का  श्रोंत
अपनी  जिजीविषा  धुंध  लेंगे  

मेरे  जज्बों  ,मेरे  हौसलों  से,
  मुझे  धोखा  ना  मिला ;
बस  समय  पर  किस्मत  का  साथ  और
मेहनत का  मौका  ना  मिला

क्या  हुआ   गर  कुछ  क्षण  बीत   गए,
कुछ  मौके  छुट  गए ,
नए  अवसर  फिर  से  आयेंगे ,
हैं  तैयार ,इस  बार  नहीं  गवाएंगे ;

जो  ना  भी  आये  तो  गम  नहीं
है  यकीं ,
अपने  मौके  हम  खुद  बनायेंगे ;
राह  की  हर  बाधा  से  टकरायेंगे ,
पर  सजाये  हैं  जो  सपने
वो  पुरे  कर  के दिखायेंगे

 हमारे  सपने  रेत पर  बने  चित्र ,
पानी  पर  खिची  लकीर  नहीं ,
और  अपनी  मंजिल  ना  पा सकें,
ऐसी  भी  ख़राब  हमारी  तकदीर  नहीं

जो  तकदीर  ने  भी  बदला  रुख ,
तो  उसे  मोड़  देंगे ,
हौसलें  बुलंद हैं अपने,
भाग्य  के  हर  बेड़े को  तोड़  देंगे ।

कसम  है  हमें  इश्वर  की,
अपना  चरित्र  इतना  ऊँचा  बनायेंगे,
की  रास्ते   अपने  आप  बनते  जायेंगे,
हम  नहीं  जायेंगे ,
मंजिल  खुद
हमारे  कदम  चूमने  आयेंगे ।।।

0 comments: