जो थिरके न किसी के कदम ,तो साज का क्या फायदा ।
कोई सुनना ही न चाहे ,तो आवाज़ का क्या फायदा ।
बात छिपाने का लुत्फ़ ,किसी को बताकर ही होती है ;
जो कोई हो न हमराज़,तो राज का क्या फायदा ।
मुस्कुराना पर्दा-ए-नशीं का ,काफी नहीं शायर के लिए;
रुख से जो हटा पाए न हिजाब ,तो अलफ़ाज़ का क्या फायदा ।
सजें कितना भी वो, शीशे में खुद का अक्स निहारते हुए ;
वो नजरें ही न मिलें , तो हुस्न-ए -अंदाज़ का क्या फायदा ।
बैठे बिठाये, आज काफिर बन जातें हैं इन्सां ;
जो पकड़ इतनी भी नहीं ,तो उस धर्मो समाज का क्या फायदा ।
छोटी नावें ही चलती हैं नदियों में "सागर" , पर मीठी तो है ;
जो प्यास बुझा न पाए किसी की ,तो असंख्य समुद्री जहाज का क्या फायदा ।।
....संदीप सौरभ "सागर"
कोई सुनना ही न चाहे ,तो आवाज़ का क्या फायदा ।
बात छिपाने का लुत्फ़ ,किसी को बताकर ही होती है ;
जो कोई हो न हमराज़,तो राज का क्या फायदा ।
मुस्कुराना पर्दा-ए-नशीं का ,काफी नहीं शायर के लिए;
रुख से जो हटा पाए न हिजाब ,तो अलफ़ाज़ का क्या फायदा ।
सजें कितना भी वो, शीशे में खुद का अक्स निहारते हुए ;
वो नजरें ही न मिलें , तो हुस्न-ए -अंदाज़ का क्या फायदा ।
बैठे बिठाये, आज काफिर बन जातें हैं इन्सां ;
जो पकड़ इतनी भी नहीं ,तो उस धर्मो समाज का क्या फायदा ।
छोटी नावें ही चलती हैं नदियों में "सागर" , पर मीठी तो है ;
जो प्यास बुझा न पाए किसी की ,तो असंख्य समुद्री जहाज का क्या फायदा ।।
....संदीप सौरभ "सागर"

0 comments:
Post a Comment