Tuesday, March 20, 2012

gazal

जो थिरके न किसी के  कदम ,तो साज का क्या फायदा ।
कोई सुनना  ही न चाहे ,तो आवाज़ का क्या फायदा  ।

बात छिपाने का लुत्फ़ ,किसी को बताकर ही होती है ;
जो कोई हो न हमराज़,तो राज का क्या फायदा ।

मुस्कुराना पर्दा-ए-नशीं का ,काफी नहीं शायर के  लिए;
रुख से जो हटा पाए न हिजाब ,तो अलफ़ाज़ का क्या फायदा ।

सजें  कितना भी वो, शीशे में खुद का अक्स निहारते हुए ;
वो नजरें  ही न मिलें , तो हुस्न-ए -अंदाज़ का क्या फायदा । 


बैठे बिठाये, आज काफिर  बन जातें हैं इन्सां ;
जो पकड़ इतनी भी नहीं ,तो उस धर्मो समाज का क्या फायदा ।

छोटी नावें ही चलती हैं नदियों में "सागर" , पर मीठी तो है ;
जो प्यास बुझा न पाए किसी की  ,तो असंख्य समुद्री  जहाज का क्या फायदा ।।

                                                                                                  ....संदीप सौरभ "सागर" 

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