Wednesday, January 4, 2012

.मुस्कुराये कैसे

मुन्तजिर निगाहें झपकती ही  नहीं ...
नींद आये भी तो आये कैसे...

नादाँ भी  हैं और  है इल्म  हर बात का ..
खुद को कोई समझाए भी तो समझाए कैसे ..

परिंदे होकर सैयाद के दाने चुग लिए ..
उड़ने को अब पंख  फड़फड़ाए भी तो  फड़फड़ाए कैसे ..

दिल की मुखबिरी मघज़ को दे रखी है ..
उसकी मनचली सोच को रोके  भी तो कोई रोक पाए कैसे,,..

मसीहा खुद ही तू चला था बनने..
इन्सां बनने को छटपटाये भी  तो अब छटपटाये कैसे ...

कुछ इस कदर बदल लिया ,उस चेहरे का नामों निशाँ ..
अक्स देखे भी तो ,खुद को पहचान पाए कैसे ...

एहसासों की सौदागिरी में पूँजी  भी लुट गयी ..
अब घर जाना चाहे भी तो जाये कैसे..

उलझते ही जाते हैं महीन रेशमी धागों सी जिंदगी ...
उन हाथों के बिना सुलझाये भी तो कोई सुलझाये कैसे...

वो  candy वो  cake , east gate और roller skate
वो roll   वो     doll ..और  doll ki पलकें
पलकें झपकाए भी तो  अब कोई झपकाए कैसे...

उन गेसुओं की चोटी, उन हाथों की मुलायम रोटी ..
उन कन्धों के सहारे ,वो प्यारे प्यारे गैस  के गुब्बारे....
उन गुब्बारों से खेलना चाहे भी  तो कोई खेल पाए कैसे...

इन सर्दियों में होंठ इतने फट गए हैं...की गोलू ..
वैसलीन की उस डिबिया बिना...
चाहे भी तो भोलू मुस्कुराये कैसे ..मुस्कुराये कैसे ....

न जाने ये सर्दियां कब जाएगी !!!!
.


0 comments: