यूँ ही आज ..सुबह सुबह .
शबनम की बूंदों को
पूरब में लालिमा छा चुकी थी .. ..
शब् और सुबह की मिलन और जुदाई की ..
गवाही देती ओंस की वो चंद बूँदें
उषा किरण पड़ते ही चमक उठी ...
जैसे अक्सर अनायास ही ....
शबनम की बूंदों को
हथेलियों पर रखकर देखा ...;
गुजरे शब् की
ठंडक मौजूद थी
जैसे जाती हुई रात ने
अपने हर लम्हे का
हिसाब छोड़ रखा हो ..और
पेड़ो, पत्तों ,नन्ही किसलयों पर
अपने हर लम्हे का
हिसाब छोड़ रखा हो ..और
पेड़ो, पत्तों ,नन्ही किसलयों पर
बैठने से पहले.....
फिजाओं में से इन तमाम लम्हों को
खुद में समेत लिया था ..
खुद में समेत लिया था ..
इन ओंस की बूंदों ने ..
शबनम मेरी हथेलियों पर
शबनम मेरी हथेलियों पर
फ़ैल चुकी थी....
उन गिले हथेलियों को देखकर लगा ..
उन गिले हथेलियों को देखकर लगा ..
हर किसी की छाप.. ,छुट ही जाती है ..
कहीं न कहीं ..
लोग चले जाते हैं ..
लोग चले जाते हैं ..
यादें नहीं ....
पूरब में लालिमा छा चुकी थी .. ..
शब् और सुबह की मिलन और जुदाई की ..
गवाही देती ओंस की वो चंद बूँदें
उषा किरण पड़ते ही चमक उठी ...
जैसे अक्सर अनायास ही ....
चमक उठती है ..हमारे जेहन में
कुछ यादें ..
शबनम की इन्ही बूंदों की तरह
कुछ यादें ..
शबनम की इन्ही बूंदों की तरह

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