क्या हुआ गर अपना जीवन बहार नही,
खिजाओं की माटि है ।
शायद सुना नही आपने
कभी बहारें भी बूँद बूँद को तरस जाती हैं ,
और घटायें सेहरा में बरस जाती हैं ।
यह तो इश्वर की प्रकृति और इंसान की
शख्सियत पर निर्भर है , की ,
कौन किसको कितना लुभाती है ...
हो सकता है आपके वसंत में भी
ख़ामोशी हो,
पर अपने यहाँ तो पतझड़ में भी,
कोयलें गीत सुनती हैं ॥
खिजाओं की माटि है ।
शायद सुना नही आपने
कभी बहारें भी बूँद बूँद को तरस जाती हैं ,
और घटायें सेहरा में बरस जाती हैं ।
यह तो इश्वर की प्रकृति और इंसान की
शख्सियत पर निर्भर है , की ,
कौन किसको कितना लुभाती है ...
हो सकता है आपके वसंत में भी
ख़ामोशी हो,
पर अपने यहाँ तो पतझड़ में भी,
कोयलें गीत सुनती हैं ॥


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