Monday, October 11, 2010

avyaya

इस निरंतर परिवर्तनशील लोक के परिवेश में
जहां हर क्षण ,हर तत्त्व होता है परिवर्तित
कभी ख़ुशी,कभी गम तो कभी कोई
अन्य भावावेश में

उन पत्थरों के मध्य ,जो सदा ही रहते हैं
किसी कृत्रिम भेष में,
ना जाने मिले वो कोहिनूर ,कब कहाँ और
की वेश में

धुंध उसे हर गली, नुक्कड़,  चौराहे,हर राज्य और
हर देश में ,
और थककर हार गया जब ,तब आ गया मैं भी
तैश में

फिर स्वतः  स्मरण हुआ की
"परिवर्तन ही संसार का नियम है "
उसी ने लिखा है ,अपने सुवचनो के
समावेश में .

तब आया समझ की अप्राप्य है
शिथिल गतिशील ,नित्य नवीन
वह दिव्य अव्यय
गतिशील मृत्य्लोक के परिवेश में
जब तक साधना, साध्य,भक्ति से दूर
जीते रहेंगे सभी अपने सुख और ऐश में .

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