Monday, October 11, 2010

ये मेरा मन

अभी तो माप रहा था, समुद्र की गहराई
और अब व्योम के क्षितिज पर उसकी नजर है
अभी उलझा था सूर्य की लपटों में
और अब चन्द्र की शीतल जमीन ही उसकी डगर है

वर्तमान से भूत,भूत से भविष्य
तय न किया हो जो इसने
वो  कौन सा सफ़र है
और सफ़र ककी घडी भी क्या
मनो बस एक पल का अंतर है

कभी अन्तरिक्ष यात्री तो कभी ज्योतिष्य विद्यार्थी
कभी  डॉक्टर तो कभी मात्र ज्ञानार्थी
हर पद पर तो कर चूका ये शिरकत है
पर ख़त्म न हुई  हो तलाश,अब bhi
ऐसी इसकी हरकत है

इसकी गति की क्या सीमा
हर प्रक्षेपास्त्र इसके  समक्ष नतमस्तक है
है कभी यहाँ तो कभी वहाँ
हर क्षण  बदलता इसके घर का दस्तक है

किया नहीं कभी इसने क्रंदन
नहीं भाता है इसे कोई बंधन
ये है मस्तमौला दीवाना वैरागी,है ये चन्दन
जो धुन्धता है सदा एक दूजा ही कुंदन

वक़्त है इसका गुलाम ,है मुट्ठी में
इसके हर एक क्षण ..
खैर मैं तो हूँ  ,केवल एक मंदबुद्धि
सामान्य जन
पर बड़ा ही तेज़स्वी आकंशी  और चालू है
ये मेरा मन

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