दिया तुने सत्य को महत्व ,
फिर क्यूँ बना दिया मिथ्या भी एक तत्त्व
इंसान बनाया उसे इंसानियत दी
फिर उसी में तुने क्यूँ शैतानियत भर दी
हृदय दिया ,उसे बुद्धि भी दी ,
फिर दोनों की भावना विपरीत क्यूँ कर दी
सागर बनाया ,उसे जल भी दिया , फिर
उसी जल में क्युन्लावन घोल दिया
सावन लाये ,हरियाली से जग भर दिया,फिर
पतझड़ को क्यूँ आमंत्रण दे दिया
सुख दिया पर दुःख से अलग नहीं
रास्ता दिया पर बाधक से पृथक नहीं
इंसान को भक्ति दी ,उसकी शक्ति दी ,फिर क्यूँ
पुर्वांतर में ही अपनी माया में उसकी आसक्ति कर दी
एक ही पद्द के ये क्यूँ दो विप्रार्थक छंद
जिसे दी चंचलता उसे ही कर दिया निस्पंद
ये एक ही दो पूर्ण रूप के क्यूँ दो खंड
लोग मिलते हैं विनर्म पर उन्हें क्यूँ है इसका घमंड
ये कैसी है लीला ,तेरे लाल की हे नन्द
मानव श्रृष्टि को ये तेरा कैसा है दंड
कब से क्यूँ और ये कैसा है द्वन्द
क्या ये तुझे देता है आनंद
Monday, October 11, 2010
ये कैसा द्वन्द
Posted by figments89 at 1:41:00 AM
Subscribe to:
Post Comments (Atom)

0 comments:
Post a Comment